भगवन श्री कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन परिचय (PART-2) |

श्री कृष्ण ओर रुक्मणि का विवाह हुआ द्वारिका मे :-

द्वापरयुग मे अमझेरा एक राज्य जो कुंदनपुर नाम से लोकप्रिय था । वह भीष्मक का राज्य हुआ करता था उनके पांच पुत्र ओर एक सूंदर पुत्री थी जिनका नाम रुक्मणि था ।

रुक्मणि कृष्ण जी को खुद को समर्पित कर चुकी थी लेकिन इस बात से अनजान उनके पिता भीष्मक ने चंदेरी के राजा शिशुपाल से अपनी पुत्री रुक्मणि का विवाह तय कर दिया लेकिन जब उन्हें अपनी सखियों से पता चला की उनका विवाह तय कर दिया गया है तब उन्होंने एक वृद्ध ब्राह्मण के हाथ कृष्ण जो को संदेशा भेजा ।

रुक्मणि का पत्र मिलते ही वह कुंदनपुर की ओर चल दिए ओर वहाँ से उन्होंने रुक्मणि का अपहरण कर द्वारकापुरी ले गए ओर उनके साथ विधिपूर्वक विवाह किया लेकिन कृष्ण जी का पीछा करते हुए शिशुपाल भी वहाँ पहुंच गए ।

इसके बाद बलराम ने वीरतापूर्वक अपने युदवंशियो के साथ शिशुपाल ओर उनकी सेना को मार गिराया । श्री कृष्ण का उनकी पटरानियों मे रुक्मणि का मुख्य स्थान था । रुक्मणि के गर्भ से ही प्रद्युमन का जन्म हुआ था जो कामदेव के अवतार माने जाते है ओर आज भी उनकी प्रेम की कई गाथाये मिल जाएगी ।

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महाभारत युद्ध (कुरुक्षेत्र) :-

महाभारत युद्ध मे श्री कृष्ण जी अपने प्रिय सखा अर्जुन के सारथी बने इसी के साथ साथ महाभारत के महायुद्ध की पटकथा भी उन्होने ही लिखी ।

इस पटकथा से पूर्व ही वह धर्म की विजय ओर अधर्म का अंत निश्चित कर चुके थे । श्री कृष्ण जी का अर्जुन को दिया गया उपदेश बाद मे एक ग्रथ के रूप मे सबके सामने प्रस्तुत हुआ ।

श्री कृष्ण जी जो की सृष्टि के पालनकर्ता है जिनके एक इशारे से यानि सुदर्शन चक्र से सारी सृष्टि का क्षण भर मे राख बन जाना ओर उस पर भी उनका अर्जुन का सारथी बनकर महाभारत युद्ध मे चलना असहज कर देने वाला था ।

द्वारका मे हुई कृष्ण जी की मृत्यु :-

बहुत कम लोग जानते है की श्री कृष्ण जी ने कब, कहा ओर कैसे अपने देह का त्याग किया था । आइये जानते है इसे संक्षिप्त मे :-

भगवान श्री का जन्म मथुरा जरूर हुआ था लेकिन उनका सारा बचपन, किशोरवस्था गोकुल, वृंदावन, नंदगाव, बरसाना, द्वारिका आदि जगहों पर बिता । द्वारिका मे उन्होंने ३६ वर्ष रहे ओर सारी भागदौड़ संभाली। ओर घरपरिवार के साथ सुखपूर्वक समय बिताया ।

गांधारी ने जो शाप दिया था उसके चलते सभी कृष्णवंशी सोमनाथ के पास प्रभास क्षेत्र मे इक्कठे हुए । प्रभास के युद्ध मे चार लोग-बलराम जी, कृष्ण जी, वभ्रु , दारुक (सारथी) ने भाग नहीं लिया ।

बलराम के कही चले गए ओर उनका पता न लगने पर कृष्ण जी बहुत ही दुखी हुए । उन्होंने द्वारका जाकर दारुक को अर्जुन के पास भेजा ओर वह से स्त्री ओर बचो को हस्तिनापुर ले जाने को कहा । लेकिन कुछ स्त्रियों ने पहले ही प्राण दे दिए थे ओर कुछ स्त्री बच्चो को लिवा लाये ।

अर्जुन को मार्ग मे जंगली आभीरो से मुकाबला करना पड़ा जिसमे से कुछ स्त्रियों को आभीरों ने लूट लिया ओर बची स्त्रियों ओर बच्चो को अर्जुन ने कुरु देश ओर शाल्व देश मे बसा दिया ।

कृष्ण जी शोक मे थे ऐसे मे वे सोमनाथ के पास स्थित प्रभास क्षेत्र के एक घने वन मे चले गए ओर एक पेड़ के नीचे लेट गए । एक बेहलिये ने जिसका नाम जरा था उसने हिरन के भ्रम मे श्री कृष्ण जी के पैर मे तीर मार दिया ओर उन्होंने वही अपनी प्राण त्याग दिए । श्री कृष्ण जी के देहांत के बाद कलयुग का आरंभ हो गया ।

आशा करती हूँ की आपको इस लेख से कृष्णा जी के जीवन की सम्पूर्ण जानकारी मिली होगी । यदि आपको ये लेख उपयोगी लगे तो इसे सोशल मीडिया पर शेयर जरूर करें। ताकि आपकी वजह से और किसी को भी यह जानकारी मिल पाए |

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