गणेश जी और उनके उत्सव (गणेश चतुर्थी) का इतिहास ।
हुआ था। गणेश जी शिवजी और पार्वती माता के पुत्र हैं ओर सर्वप्रथम पूजनीय हैं। इनका हिन्दू धर्म में सर्वोपरि स्थान है।
श्री गणेश जी विघ्न विनायक होने के साथ-साथ गणों के स्वामी, एकदन्त और चतुर्बाहु भी माने जाते हैं। इनकी पूजा-अर्चना सभी जगह सर्वप्रथम की जाती है। उनका वाहन मूषक हैं। वे संसार के साधनों के स्वामी भी माने जाते हैं। गणेश जी के हाथी जैसे सिर होने के बहुत सी कथाएँ प्रचलित हैं। इसलिए इन्हें गजानन भी कहा जाता हैं।
गणेश जी हिन्दुओं के आराध्य देव भी कहलाते हैं। धार्मिक उत्सव हो या फिर वैवाहिक कार्यक्रम या फिर मन्दिरों मे पूजन हर जगह शुरुआत गणपति पूजन से से ही की जाती है।
भगवन गणेश का इतिहास – Ganesh Bhagwan History (Part-1)
शंकर जी ने ही सर्वप्रथम गणेश जी की पूजा का प्रावधान शुरु किया। ये पर्व दसवें दिन अनंत चतुर्दशी तक मनाया जाता हैं। ओर गणेश विसर्जन दस दिन में कर देना चाहिए। ये त्योहार पुरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध हैं।
भगवन गणेश जी की बहुत एतिहासिक कथाएँ प्रचलित हैं। जो आप कथाओं के रूप में पढ़ सकते हैं। लेकिन इस धरहोर पर गणेश उत्सव की शुरुआत शिवाजी महाराज के शासनकाल से हुई थी। गणेश जी उनके पूजनीय, महागुरु, आदर्श सभी थे। इस अवसर का प्रारंभ संस्कृति को बढ़ावा देना था।
माना जाता हैं। कि शिवाजी की माता जीजाबाई ने पुणे के क़स्बा में गणेश जी की स्थापना की थी ओर हर वर्ष सार्वजनिक समारोह में साम्राज्य के कुलदेवता के रूप में उनको पूजने की प्रथा भी थी। ये पर्व पेशवाओ के शासन काल तक ही चला !
इतिहासकारों के तथ्यों के अनुसार पेशवाओ का स्थान राजा के बाद ही आता था। दरअसल पेशवा एक फारसी शब्द हैं। यानि ये पेशावर राजा के सलाहकार परिषद में सबसे अहम किरदार होते थे ! इस परिषद मे यानि अष्ट प्रधान मंत्रिमंडल में पेशावर प्रधान मंत्री या वजीर के पद पर होते थे।
एक तरफ मराठा प्रदेश के राजाओं के आपस में संघर्ष चल रहे थे। तो दुसरी तरफ अंग्रेजों का आतंक पुरे जोरो पर था ओर जब यशवंतराव होल्कर ने पेशवा बाजीराव द्वितीय को पराजित कर दिया तभी बाजीराव द्वितीय बसई भाग गए। वहाँ पहुँचकर जब उन्होने ब्रिटिश से शरण मांगी तो उसके बदले ब्रिटिशों ने बाजीराव से अपमानजनक शर्तों की संधि करवाई।
इसके बदले पेशवा से ब्रिटिश सेना की एक टुकड़ी रखने और 20 लाख रुपए की वार्षिक आय का अपना इलाका ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप देने पर सहमत होना पड़ा। संधि की एक ओर शर्त के अनुसार- पेशवा ईस्ट इंडिया कंपनी के आदेशानुसार काम करेंगे।फलस्वरूप इन संधियों से ब्रिटिश सत्ता ने मराठा को अपने कब्जे मे कर लिया ! माना जाता हैं। इसके बाद से गणेश पर्व पारिवारिक उत्सव तक ही सीमित रह गया !
अंग्रेजों की सत्ता में कानून का विरोध करना तो दूर की बात यदि अपने हक के लिए विरोध प्रदर्शन करना या भीड़ दिखे तो सीधा गिरफ्तार कर लिया जाना ओर राजनीतिक कार्यक्रमों की मनाही ये सब देशद्रोह मे ही आते थे। यानी अंग्रेजों के जुल्मो की हद कम नही थी। जिन वाक्यों से हम सभी वाकिफ हैं।
भगवन गणेश का इतिहास – Ganesh Bhagwan History (Part-2)
पेशवाओं के शासन काल के बाद बाल गंगाधर तिलक ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गणेशोत्सव की शुरूआत सार्वजनिक रूप से बड़े पैमाने पर दुबारा करवाई। ! उसी बीच लोकमान्य गंगाधर तिलक ‘स्वराज’ का मन में विचार लिए इसे घर-घर पहुंचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे ओर इसी संघर्ष के चलते वे सभी लोगों में एकता कायम करना चाहते थे।
ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, गणेश जी की स्थापना भले ही 1630 से हुई हो लेकिन 1893 में पहली बार गणेश उत्सव की शुरुआत बाल गंगाधर तिलक ने की और सार्वजनिक पर्व मनाने का आव्हान किया। इस धार्मिक कार्यक्रम के चलते अंग्रेज चाहकर भी कुछ भी नहीं कर पाए ! इस तरह यह पर्व समुदायिक बन गया ओर लोगो का आपस मे मेलजोल और समुदायों का बार-बार मेलजोल से लोगों में एकजुटता और भाईचारा को खूब बढ़ावा मिला ! अंत में यही पर्व स्वराज हासिल करने के लिए ब्रम्हास्त्र का काम कर गया !
आशा करती हूँ आपको इस लेख से भगवान् गणेश जी के बारे में बहुत कुछ जान गए होंगे । यदि आपको ये लेख उपयोगी लगे तो इसे सोशल मीडिया पर शेयर जरूर करें। ताकि आपकी वजह से और किसी को भी यह जानकारी मिल पाए |

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